भारतीय संविधान के आपात उपबंध ( राष्ट्रीय आपात ( अनुच्छेद 352) आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव अन्य मूल अधिकारों का निलंबन अनुच्छेद- 358 और 359 में अंतर राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360) और उसके प्रभाव)

भारतीय संविधान के द्वारा आपात उपबंध के तहत आपातकालीन की व्यवस्था की गई है जो तीन प्रकार के हैं।

भारतीय संविधान में तीन प्रकार के आयात काल की व्यवस्था की गई है :-
(1)  राष्ट्रीय आपात (अनुच्छेद 352), राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) एवं वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360)

  1. राष्ट्रीय आपात ( अनुच्छेद 352) :-  इसकी घोषणा निम्नलिखित में से किसी भी आधार पर राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है -(1)युद्ध,(2) बाह्य आक्रमण और (3) सशस्त्र विद्रोह।
  2. राष्ट्रीय आपात की घोषणा राष्ट्रपति मंत्रिमंडल की लिखित सिफारिश पर करता है।
  3. राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा को न्याय में प्रश्नगत किया जा सकता है।
  4. 44 व संशोधन द्वारा अनुच्छेद 352 के अधीन उद्घोषणा संपूर्ण भारत में या उसके किसी भाग में की जा सकती है।
  5. राष्ट्रीय आपात के समय राज्य सरकार निलंबित नहीं की जाती है ; अपितु वह संघ की कार्यपालिका के पुणे नियंत्रण में आ जाती है।
  6. राष्ट्रपति द्वारा की गई आपात की घोषणा एक माह तक प्रवर्तन में रहती है और यदि इस दौरान इस संसद के दो तिहाई बहुमत से अनुमोदित करवा लिया जाता है, तो वह छह माह तक प्रवचन में रहती है। संसद इसे पुनः एक बार में 6 महीने तक बढ़ा सकती है।
  7. यदि आप आप की उद्घोषणा तक की जाती है कमर जब लोकसभा का विघटन हो गया हो या लोकसभा का वेतन एक मास के अंतर्गत आपात उद्घोषणा का अनुमोदन के बिना हो जाता है , तो आपात उद्घोषणा लोक सभा की प्रथम बैठक की तारीख से 30 दिन के अंदर अनुमोदित होना चाहिए, अन्यथा 30 दिन के बाद यह प्रवर्तन में नहीं रहेगी।
  8. यदि लोक सभा साधारण बहुमत से आप आ तो घोषणा को वापस लेने का प्रस्ताव पारित कर देती है, तो राष्ट्रपति को उद्घोषणा वापस लेनी पड़ती है।
  9. आपात घोषणा पर विचार करने के लिए लोकसभा का विशेष अधिवेशन तब आहूत किया जा सकता है, जब लोकसभा की कुल सदस्य संख्या के 1/10 सदस्यों का लिखित सूचना लोकसभा अध्यक्ष को कौन मान जब सत्र चल रहा हो या राष्ट्रपति को, जब सत्र नहीं चल रहा है, दी जाती है।
  10. लोकसभा अध्यक्ष या राष्ट्रपति सूचना प्राप्ति की 14 दिनों के अंदर लोकसभा का विशेष अधिवेशन आहूत करते हैं हैं।
  11. आपातकाल की उद्घोषणा के प्रभाव :
    जब कभी संविधान  के अनुच्छेद 352 के अंतर्गत आपातकाल की उद्घोषणा होती है कोनो तो इसके यह प्रभाव होते हैं :-
    1.  राज्य की कार्यपालिका शक्ति संगी कार्यपालिका के अधीन हो जाती है।
    2.  संसद की विधाई शक्ति राज्य सूची से  संबद्ध विषयों तक विस्तृत हो जाती है। अर्थात संसद को राज्य सूची में वर्णित विषय पर कानून बनाने का अधिकार प्राप्त हो जाता है। अतः केंद्र तथा राज्यों के मध्य विधाई शक्तियों के समान वितरण का निलंबन हो जाता है, यद्यपि राज्य विधायिका निलंबित नहीं होती है। संक्षेप में संविधान संगी की जगह एकात्मक हो जाता है। संसद द्वारा आपातकाल में राज्य के विषय पर बनाए गए कानून आपातकाल की समाप्ति के बाद छह माह तक प्रभावी रहते हैं।
  12. जब राष्ट्रीय आपातकाल की उद्घोषणा लागू हो तब राष्ट्रपति केंद्र तथा राज्यों के मध्य करो कि संवैधानिक वितरण को  संशोधित कर सकता है पूर्णविराम इसका तात्पर्य है कि राष्ट्रपति केंद्र से राज्यों को दिए जाने वाले धनविथ को कम अथवा समाप्त कर सकता है। ऐसे संशोधन उस वित्त वर्ष की समाप्ति तक जारी रहते हैं जिसमें आपातकाल समाप्त होता है।
  13. राष्ट्रीय आपातकाल की स्थिति में लोकसभा का कार्यकाल इसकी सामान्य कार्यकाल ( 5 वर्ष) से चल के संसद द्वारा विधि बनाकर एक समय में 1 वर्ष के लिए (कितनी भी समय तक)  बढ़ाया जा सकता है। किंतु या विस्तार आपातकाल की समाप्ति के बाद छह माह से ज्यादा नहीं हो सकता। उदाहरण के लिए पांचवी लोकसभा 1971- 70 का कार्यकाल 2 बार एक समय में 1 वर्ष के लिए बढ़ाया गया था।
  14. अनुच्छेद -358 एवं 359 राष्ट्रीय आपातकाल में मूल अधिकार पर प्रभाव का वर्णन करते हैं। अनुच्छेद- 358, अनुच्छेद- 19 द्वारा किए गए मूल अधिकारों के निलंबन से संबंधित है, जबकि अनुच्छेद- 359 अन्य मूल अधिकारों के निलंबन (अनुच्छेद 20 एवं 21 जवारा प्रदत्त अधिकारों छोड़कर )सें संबंधित है।
  15. अनुच्छेद- 358 के अनुसार जब राष्ट्रीय आपात की उद्घोषणा की जाती है तब अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकार स्वता ही निलंबित हो जाते हैं। दूसरे शब्दों में, राज्य अनुच्छेद- 19 द्वारा प्रदत्त 6 मूल अधिकारों को कम करने अथवा हटाने के लिए कानून बना सकता है अथवा कोई कार्यकारी निर्णय ले सकता है । ऐसे किसी कानून का कार्य को, कम इस आधार पर की अनुच्छेद -19 द्वारा प्रदत्त 6 मूल अधिकारों का उल्लंघन है, चुनौती नहीं दी जा सकती। जब राष्ट्रीय आपातकाल समाप्त हो जाता है, अनुच्छेद -19 स्वत: पुनर्जीवित हो जाता है।
  16. 1978 में 44 संशोधन अधिनियम  के अनुच्छेद -358 की संभावना पर दो प्रकार से प्रतिबंध लगा दिया है। प्रथम अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त मूल अधिकारों को  युद्ध अथवा बाह्य आक्रमण के आधार पर
    घोषित आपातकाल में ही निलंबित किया जा सकता है ना कि सशस्त्र विद्रोह के आधार पर। दूसरे, केवल उन विधियों को जो आपातकाल से संबंधित है और चुनौती नहीं दी जा सकती है तथा ऐसे विधियों के अंतर्गत दिए गए कार्यकारी निर्णयों को भी चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  17. अन्य मूल अधिकारों का निलंबन :-
    अनुच्छेद -359 राष्ट्रपति को आपात काल में मूल अधिकारों को लागू करने के लिए न्यायालय जाने के अधिकार को निलंबित करने के लिए अधिकृत करता है पूर्व रहता 359 के अंतर्गत मूल अधिकार नहीं अभी तो उनका लागू होना निलंबित होता है। वास्तविक रूप में यह अधिकार जीवित रहते हैं केवल इनके तहत उपचार निलंबित होता है। यह निलंबन उन्हीं मूल अधिकारों से संबंधित होता है, जो राष्ट्रपति के आदेश में वर्णित होते हैं। जब राष्ट्रपति का आदेश प्रभावी रहता है तो उस राज्य उस मूल अधिकारों को रोकने व टोपी हटाने के लिए कोई भी विधि बना सकता है या कार्यकारी कदम उठा सकता है। ऐसे किसी भी विधि का कार्य को इस आधार पर चुनौती नहीं दी जा सकती है कि यह संबंधित मूल अधिकार से सामने नहीं रख उन्होंने इस विधि के प्रभाव  मैं किए गए विदाई वह कार्यकारी कार्यों को आदेश समाप्ति के उपरांत चुनौती नहीं दी जा सकती है।
  18. 44 वॉ संविधान संशोधन अधिनियम 1978, अनुच्छेद- 359 क्षेत्र में दो प्रतिबंध जाता है। प्रथम, राष्ट्रपति अनुच्छेद भी सफाई किस के अंतर्गत दिए गए अधिकारों को लागू करने के लिए न्यायालय में जाने के अधिकार को निलंबित नहीं कर सकता है। यानी अपराध के लिए दोष सिद्धि के संबंध में संरक्षण का अधिकार (अनुच्छेद -20) तथा प्राण और दैहिक स्वतंत्रता का अधिकार (अनुच्छेद -21), आपातकाल में भी प्रभावी रहता है। देती केवल उन्हीं विधियों को चुनौती से संरक्षण प्राप्त है जो आपातकाल से संबंधित है,  उन विधियों व कार्यों को नहीं जो इनके तहत बनाए गए हैं।
  19. अनुच्छेद- 358 और 359 में अंतर :-
    1.  अनुच्छेद -358 केवल अनुच्छेद -19 के अंतर्गत मूल अधिकारों से संबंधित है, और जबकि अनुच्छेद- 368 उन सभी मूल अधिकारों से संबंधित है, जिनका राष्ट्रपति के आदेश ज्यादा निलंबन हो  जाता है।
  20. अनुच्छेद -358 स्वत: ही, आपातकाल की घोषणा होने पर अनुच्छेद -19 के अंतर्गत के मूल अधिकारों का निलंबन कर देता है। दूसरी और, अनुच्छेद- 368 मूल अधिकारों का निलंबन सोता है नहीं करता। यह राष्ट्रपति को शक्ति देता है कि वह मूल अधिकारों के निलंबन को लागू करें।
  21. अनुच्छेद -358 केवल बाहर आपातकाल (जब युद्ध या बाहरी आक्रमण के आधार पर आपातकाल घोषित हो ) मे लागू होता है ना कि आंतरिक आपातकाल (जब सशस्त्र विद्रोह के कारण आपातकाल घोषित हो) के समय। दूसरी ओर अनुच्छेद 359 है तथा आंतरिक दोनों आपातकाल में लागू होता है।
  22. अनुच्छेद -358, अनुच्छेद -19 को आपातकाल की संपूर्ण अवधि के लिए निलंबित कर देता है जबकि अनुच्छेद -359 मूल अधिकारों के निलंबन को राष्ट्रपति द्वारा उल्लेख की गई अवधि के लिए लागू करता है। यह अवधि संपूर्ण आपातकालीन अवधि  या अल्पावधि हो सकती है।
  23. अनुच्छेद -358 संपूर्ण देश में तथा अनुच्छेद -359 संपूर्ण देश अथवा किसी भाग विशेष में लागू हो सकता है।
  24. अनुच्छेद -358, अनुच्छेद -19 को पूर्ण रूप से निलंबित कर देता है अनुच्छेद -359, अनुच्छेद- 20 व 21 के निलंबन को लागू नहीं करता है।
  25. अनुच्छेद- 358 राज्य को अनुच्छेद -19 के अंतर्गत मूल अधिकारों पर शाम भी नहीं रखने वाले नियम बनाने का अधिकार देता है  अनुच्छेद- 359 केवल उन्हीं मूल अधिकारों को संबंध में ऐसे कार्य करने का अधिकार देता है, जिन्हें राष्ट्रपति के आदेश द्वारा निलंबित किया  गया है।
  26. अनुच्छेद 352 के अधीन बाह्य आक्रमण के आधार पर आपात की प्रथम घोषणा चीनी आक्रमण के समय 26 अक्टूबर, 1962 ई० को गई थी। यह उद्घोषणा 10 जनवरी,1968 ई० को वापस ले ली गई।
  27. दूसरी बार आप आप की उद्घोषणा 3 दिसंबर, 1971 ई०को पाकिस्तान से युद्ध की समय की गई ( बाह्य आक्रमण के आधार पर)।
  28. तीसरी बार राष्ट्रीय आपात की घोषणा 26 जून, 1975 ई० को आंतरिक गड़बड़ी की आशंका के आधार पर जारी की गई थी।
  29. दूसरी तथा तीसरी उदघोषणा को मार्च, 1977 ई० में वापस दी गई।
  30. राज्य में राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) :-
    अनुच्छेद 356 के अधीन राष्ट्रपति किसी की राज्य में यह समाधान हो जाने पर कि राज्य में संविधानिक तंत्र हो गया है अथवा राज्य संघ की कार्यपालिका के किंही निर्देशों का अनुपालन करने में असमर्थ रहता है, तो आपात स्थिति की घोषणा कर सकता है।
  31. राज्य में आपात की घोषणा के बाद संघ के न्यायिक कार्य छोड़कर राज्य प्रशासन के कार्य अपने हाथ में ले लेता है।
  32. राज्य में आपात उद्घोषणा की अवधि 2 माह से होती है। इससे अधिक के लिए संसद से अनुमति लेनी होती है तब यह 6 मास की होती है। अधिकतम 3 वर्ष तक यह एक राज्य के प्रवर्तन में रह सकती है। इससे अधिक के लिए संविधान में संशोधन करना पड़ता है।
  33. सर्वप्रथम पंजाब राज्य में अनुच्छेद 356 का प्रयोग किया गया।
  34. वित्तीय आपात (अनुच्छेद 360) :-
    अनुच्छेद 360 के वित्तीय आपात की उद्घोषणा राष्ट्रपति द्वारा तब की जाती है, जब उसे विश्वास हो जाए कि ऐसी स्थिति विद्यमान है, जिसके कारण भारत के वित्तीय साख को खतरा है।
  35. वित्तीय आपात की घोषणा को दो महीनों के भीतर संसद के दोनों सदनों में सम्मुख रखना तथा उनकी स्वीकृति प्राप्त करना  आवश्यक है।
  36. वित्तीय आपात की घोषणा उस समय की जाती है, जब लोकसभा विघटित हो, तो 2 महीने के भीतर राज्यसभा की स्वीकृति मिलने के उपरांत वह आगे भी लागू रहेगी। किंतु नवनिर्वाचित लोकसभा द्वारा उसकी प्रथम बैठक के आरंभ से 30 दिन के भीतर ऐसी घोषणा की स्वीकृति आवश्यक है।
  37. इसकी अधिकतम समय-
    सीमा निर्धारित नहीं की गई है। यानी एक बार यदि इसे संसद के दोनों सदनों से मंजूरी प्राप्त हो जाए तो वित्तीय आपात अनिश्चितकाल के लिए तब तक प्रभावी रहेगा जब तक इसे वापस न लिया जाए।
  38. राष्ट्रपति वित्तीय आपात की घोषणा को किस समय वापस ले सकता है।
  39. वित्तीय आपात का प्रभाव :-39(1).  उच्चतम न्यायालय को  उच्च न्यायालय के न्यायाधीश और संघ तथा राज्य सरकारों के अधिकारियों के वेतन में कमी  की जा सकती है।
  40. राष्ट्रपति आर्थिक दृष्टि से किसी भी राज्य सरकार को निर्देश दे सकता है।
  41. राष्ट्रपति कोई अधिकार प्राप्त हो जाता है कि वह राज्य सरकारों को यह निर्देश दे कि राज्य के समस्त वित्त विधेयक उसकी स्वीकृति से विधानसभा में प्रस्तुत किए जाए।
  42. राष्ट्रपति केंद्र तथा राज्यों में धन संबंधी विभाजन के प्रावधानों में  संशोधन कर सकते हैं।

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