How Many Vyanjan in Hindi | हिंदी में कुल कितने व्यंजन होते हैं

How Many Vyanjan in Hindi हिंदी में कुल कितने व्यंजन होते हैं हिंदी व्याकरण में व्यंजन का बहुत ही महत्वपूर्ण स्थान है व्यंजन से ही हिंदी वर्णमाला तैयार होती है व्यंजन के कारण है इसी भाषा को लिखना पढ़ना सीखना आसान होता है इसलिए व्यंजन को जानना बहुत ही आवश्यक होता है व्यंजन कितने प्रकार के होते हैं इसलिए यह बहुत ही महत्वपूर्ण है।

How Many Vyanjan in Hindi
How Many Vyanjan in Hindi | हिंदी में कुल कितने व्यंजन होते हैं

ऐसे अभ्यर्थी जो प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं ऐसे व्यक्तियों के लिए व्यंजन को जानना बहुत ही महत्वपूर्ण है हिंदी व्यंजन चार्ट क्योंकि यह बहुत से प्रतियोगी परीक्षाओं में पूछे जाते हैं तथा ऐसे उम्मीदवार जो नौकरी की तलाश कर रहे हैं व्यंजन क्या होते हैं उनके लिए अंग्रेजी ,गणित, विज्ञान ,इतिहास के अलावा हिंदी व्यंजन विषय का अध्ययन करना अत्यंत महत्वपूर्ण है इसी बात को ध्यान में रखते हुए हमने हिंदी व्याकरण के व्यंजन को vyanjan kya hai विशेष रूप से विशेषज्ञों के द्वारा तैयार कर विस्तृत रूप से व्यंजन के बारे में जानकारी दी है इन व्यंजन प्रश्नों का आंसर विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में एवं सरकारी नौकरियों के लिए समय-समय पर पूछे जाते हैं।

How Many Vyanjan in Hindi

व्यंजन क्या है

स्वरों की सहायता से बोले जाने वाले वर्ण व्यंजन कहलाते है। जिन ध्वनियों का उच्चारण करते समय श्वास मुख के किसी स्थान विशेष (तालु मूर्धा, ओष्ठ या दाँत) आदि का स्पर्श करते हुए निकले उन्हें व्यंजन कहते हैं। परंपरागत रूप से व्यंजनों की संख्या 33 मानी जाती है।consonant का हिंदी में अर्थ = व्यंजन होता है और यह consonant अर्थात व्यंजन एक प्रकार की Noun होती है जिसका प्रयोग वाक्य बनाने के लिए करते है इस तरह से व्यंजन स्वर का ही यह स्वरूप है

साधारण बोलचाल की भाषा में क से ज्ञ तक वर्णों को उपयोग में लाया जाता है, उन सभी बड़ों को व्यंजन कहते हैं। साधारणतया व्यंजन की संख्या 33 मानी जाती है, परंतु चार संयुक्त व्यंजन और दो द्विगुण व्यंजन को साधारण व्यंजन से मिलाने के बाद कुल व्यंजनों की संख्या 39 मानी गई है। हिंदी व्याकरण में किसी भी शब्द की उत्पत्ति का श्रेय व्यंजन को ही जाता है।क्योंकि बिना स्वर के व्यंजन नहीं बोली जा सकती है।

व्यंजन के प्रकार

(1) मूल विभाजन या अभ्यांतर प्रयत्न के आधार पर व्यंजनों के प्रकार

(i) स्पर्श व्यंजन / उदित व्यंजन / वर्गीय व्यंजन
(ii) अन्तस्थ व्यंजन
(iii) ऊष्म व्यंजन
(iv) संयुक्त व्यंजन

(i) स्पर्श व्यंजन / उदित व्यंजन / वर्गीय व्यंजन

वे व्यंजन जिनका उच्चारण करने पर जीभ मूल उच्चारण स्थानों ( कंठ,तालु,मूर्धा,दंत,ओष्ठ) को स्पर्श करती है इसीलिए ये स्पर्श व्यंजन कहलाते हैं।यह व्यंजनों के शुरू के 5 वर्ग होते है इसीलिए इन्हें वर्गीय व्यंजन भी कहा जाता है।ये व्यंजन जीभ के अलग अलग उच्चारण स्थानों के टकराने से उत्पन्न हुए हैं,इसीलिए इन्हें उदित व्यंजन भी कहा गया है।

इनकी संख्या 25 है

क वर्ग- क ख ग घ ङ (कंठ)

च वर्ग- च छ ज झ ञ  (तालु)

ट वर्ग- ट ठ ड ढ ण   (मूर्धा)

त वर्ग- त थ द ध न    (दांत)

प वर्ग- प फ ब भ म    (होठ)

(ii) अन्त:स्थ व्यंजन

अंत: का अर्थ होता है – भीतर या अंदर । जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय  जीभ,मुँह के किसी भी भाग को पूरी तरह स्पर्श नही करती अर्थात इनका उच्चारण मुह के भीतर से होता है,अंत:स्थ व्यंजन कहलाते हैं। यह 4 होते हैं। -य र ल व

(iii) ऊष्म व्यंजन

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय गर्मी उत्पन्न हो अर्थात इनके उच्चारण में मुख से हवा के रगड़ खाने के कारण ऊष्मा पैदा हो,ऊष्म व्यंजन कहलाते है।

इनकी संख्या 4 है – श,ष,स,ह ।

(iv) संयुक्त व्यंजन

जो व्यंजन दो व्यंजनों के मेल से बनते हैं,संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं।दो व्यंजनों से मिलकर बने व्यंजन को संयुक्त व्यंजन कहते हैं। इनकी संख्या 4 होती है।

इनकी संख्या 4 है – क्ष,त्र,ज्ञ,श्र ।

क्ष = क् + ष  = क्षमा,रक्षा,कक्षा

त्र = त् + र    = पत्र,त्रिशूल,त्रिनेत्र

ज्ञ = ज् + ञ   = ज्ञान,विज्ञान,यज्ञ

श्र = श् + र    = श्रवण,श्रम,परिश्रम

(2) प्राण वायु के आधार पर व्यंजनों के प्रकार

व्यंजनों को प्राण वायु के आधार पर भी बांटा गया है। इसके अनुसार व्यंजन दो प्रकार के होते हैं :–

(i) महाप्राण

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय प्राण वायु अधिक निकले या अधिक प्रयोग हो,महाप्राण कहलाते हैं।

इनकी संख्या 14 है।

5 वर्गों के सम स्थान वाले वर्ण (10) + उष्म व्यंजन (4)

अर्थात ख,घ,छ,झ,ठ,ढ,थ,ध,फ,भ,श,ष,स,ह ।

(ii)  अल्पप्राण

जिन व्यंजनों का उच्चारण करते समय प्राण वायु महाप्राण की तुलना में कम  निकले या कम प्रयोग हो,अल्पप्राण कहलाते हैं।

इनकी संख्या 19  है।

5 वर्गों के विषम स्थान वाले वर्ण (15) + अंत:स्थ व्यंजन (4)

अर्थात क,ग,ङ,च,ज,ञ,ट,ड,ण,त,द,न,प,ब,म,य,र,ल,व ।

(3) स्वर तंत्रियों के कंपन / घोष के आधार पर व्यंजनों के प्रकार

घोष के आधार पर व्यंजनों के प्रकार,स्वर तंत्रियों के कंपन के आधार पर व्यंजनों को दो भागो में बाँटा गया है :–

(i) घोष या सघोष व्यंजन

इन व्यंजनों का उच्चारण करते समय स्वर तंत्रियों में अधिक कंपन हो,घोष या सघोष वर्ण कहलाते हैं।

इनकी संख्या 20 है।

वर्गों के 3,4,5 वर्ण (15) + अंत:स्थ व्यंजन(4) + ह

ख,ग,ङ,ज,झ,ञ,ड,ढ,ण,द,ध,न,ब,भ,म,य,र,ल,व,ह

(ii) अघोष व्यंजन

इन व्यंजनों का उच्चारण करते समय स्वर तंत्रियों में घोष वर्णों की तुलना में कम कंपन होता है,अघोष वर्ण कहलाते हैं।

इनकी संख्या 14 है।

वर्गों के 1,2 वर्ण (10) + श,ष,स

क,ख,च,छ,ट,ठ,त,थ,प,फ,ष,श,स

व्यंजन एवं उनके अन्य नाम

(1) स्पर्श संघर्षी व्यंजन – च,छ,ज,झ ।

(2) संघर्षी व्यंजन – फ़,व,स,श,ह ।

(3) नासिक्य व्यंजन – ङ,न,ण,म,ञ ।

(4) निरानुनासिक व्यंजन – च,क,ट,थ ।

(5) लुंठित या प्रकम्पित व्यंजन – रये भी पढ़ें-  तर्क का अर्थ एवं परिभाषा,तर्क के प्रकार,तर्क के सोपान

(6) पार्श्विक व्यंजन – ल

(7) स्वर यंत्र मुखी या काकल्य व्यंजन – र

(8) अर्ध स्वर – य,व ।

(9) द्विगुण व्यंजन / उक्षिप्त व्यंजन – ढ़,ड़ ।

अर्ध स्वर क्या है अर्ध स्वर किसे कहते हैंअर्ध स्वर कौन से होते हैं अर्ध स्वर कितने होते हैं

ऐसे व्यंजन जिनके स्थान पर स्वर प्रयोग करने से उच्चारण में अंतर नहीं आता है अर्थात इनका स्थान स्वर ने ले लिया या यह कह सकते है की इनके जगह स्वर प्रयोग कर सकते है इसीलिए इनको अर्ध स्वर कहते हैं।

य और व अर्ध स्वर होते है। य के स्थान पर ई का प्रयोग,व के स्थान पर आ का प्रयोग करते हैं।

इनको निम्न उदाहरण से समझ सकते हैं।

गयी = गई
मिठायी = मिठाई
कौवा = कौआ
कुँवा = कुँआ

द्विगुण व्यंजन / उक्षिप्त व्यंजन / नव विकसित व्यंजन

ऐसे व्यंजन जिनके उच्चारण में जीभ कही और टकराये और फिर कही और टकरा जाए,द्विगुण या उक्षिप्त व्यंजन कहलाते हैं।इन्हें नव विकसित इसीलिए कहा जाता है क्योंकि ये वर्ण संस्कृत में नही है ये केवल हिंदी में नए आये है इसीलिये इन्हें नव विकसित कहा जाता है।

ड़ और ढ़ द्विगुण व्यंजन होते हैं।

ये व्यंजन शब्दों के बीच या अंत में प्रयोग होते हैं। इन व्यंजनों से कभी कोई शब्द शुरू नहीं होता है।

जैसे – कूड़ा,सड़ना,पढ़ना,बूढ़ा आदि।

द्वित्व व्यंजन क्या हैं द्वित्व व्यंजन की परिभाषा

जो व्यंजन दो समान व्यंजनों के संयोग से बनते हैं,वे द्वित्व व्यंजन कहलाते हैं।

जैसे – शक्कर,चक्कर,बिल्ला,दिल्ली,दद्दार आदि।

आगत व्यंजन  क्या हैं

कुछ व्यंजन बाहर से आये हैं जो हिंदी भाषा में स्वीकार कर लिए गए हैं परन्तु यह हिंदी भाषा के नहीं है।

आगत व्यंजन हैं – ज़,फ़ आदि।

(4) उच्चारण स्थान के आधार पर व्यंजनों के प्रकार

उच्चारण स्थानव्यंजन
कंठक वर्ग,ह ।
तालुच वर्ग ,य,श ।
मूर्धाट वर्ग ,र,ष ।
दंतत वर्ग ,ल,स ।
ओष्ठप वर्ग,
दंत + ओष्ठ

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