Types of Soil in India in Hindi | भारत में मिट्टी के प्रकार हिंदी में

Types of Soil in India in Hindi भारत कृषि प्रधान देश है जहां कृषि की प्रधानता है भारत में आप का सबसे मुख्य स्रोत कृषि है ठीक उसी तरह इस कृषि के लिए सबसे आवश्यक चीज है मिट्टी भारत में सभी प्रकार के फसलों के लिए उपजाऊ मिट्टी की बहुत अधिक आवश्यकता रहती है ठीक इसी तरह भारत में मिट्टी के कई प्रकार होते हैं जो फसलों के लिए बहुत ही लाभदायक होते हैं इसमें अलग-अलग फसलों के लिए अलग-अलग उपजाऊ मिट्टी की आवश्यकता होती है।

Types of Soil in India in Hindi
Types of Soil in India in Hindi | भारत में मिट्टी के प्रकार हिंदी में

हम अपने इस पोस्ट में भारत के मृदा के प्रकार तथा उन मिट्टियों का वर्णन तथा यह मिट्टियां भारत में कहां कहां मिलती हैं, मृदा के गुण different types of soil in india यह सभी जानकारियां हम अपने इस पोस्ट में भारत के मिट्टी से संबंधित जानकारी चाहने वालों के लिए विस्तार पूर्वक दे रहे हैं यह जानकारी विभिन्न प्रकार के प्रतियोगी परीक्षाओं में अक्सर पूछे जाते हैं अतः ऐसे उम्मीदवार जो प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं उनके लिए यह पोस्ट बहुत ही महत्वपूर्ण है अतः ऐसे उम्मीदवार इस पोस्ट को ध्यानपूर्वक पढ़ें एवं अन्य लोगों को भी बताएं।

Types of Soil in India in Hindi | भारत में मिट्टी के प्रकार हिंदी में

  • मृदा शब्द की उत्पत्ति लैटिन भाषा के शब्द सोलम  से हुई है | जिसका अर्थ है फर्श  मृदा,  पृथ्वी को एक पतले आवरण में ढके रहती है तथा जल और वायु की उपयुक्त मात्रा के साथ मिलकर पौधों को जीवन प्रदान करती है | भारत में सबसे अधिक (43.4%) भूभाग पर जलोढ़ मिट्टी पायी जाती है और अन्य मिट्टियों में काली मिट्टी, लाल मिट्टी और लैटराइट मिट्टी पायी जाती है |
  • भारत में पाई जाने वाली प्रमुख मिट्टियां
    • पर्वतीय मिट्टी
    • जलोढ़ मिट्टी
    • काली मिट्टी
    • लाल मिट्टी
    • लैटेराइट मिट्टी
    • मरुस्थलीय मिट्टी
    • पीट एवं दलदली मिट्टी
    • लवणीय एवं क्षारीय मिट्टी
  • जलोढ़ मिट्टी:- यह भारत के लगभग (43.4%)  क्षेत्रफल पर पाई जाती है
  • इस मिट्टी का विस्तार लगभग 15 लाख वर्ग किमी. है| 
  • जलोढ़ मिट्टी को कॉप या  कद्दारी मिट्टी भी कहते हैं|
  • यह नदियों द्वारा लाई गई मिट्टी है|
  • इस मिट्टी में पोटाश की बहुलता होती है| लेकिन नाइट्रोजन फास्फोरस एवं ह्यूमस  कमी होती है|
  • यह दो प्रकार की होती है पहला बांगर दूसरा खादर पुराने जलोढ़ मिट्टी को बांगर तथा नयी जलोढ़ मिट्टी को खादर कहा जाता है|
  • जलोढ़ मिट्टी के उर्वरकता दृष्टिकोण से काफी अच्छी मानी जाती है इसमें धान गेहूं मक्का तिलहन दलहन आलू आदि फसलें उगाई जाती है|
  • काली मिट्टी:- यह भारत के 15% भूभाग में पायी जाती है |
  • इसका निर्माण बेसाल्ट चट्टानों को टूटने फूटने से होता है
  • इसमें आयरन चुना एलुमिनियम एवं मैग्नीशियम की बहुलता होती है|
  • इस मिट्टी का काला रंग टिटेनिफेरस  मैग्नेटाइट एवं जीवाश्म की उपस्थिति के कारण होती है|
  • इस मिट्टी को और रेगुर मिट्टी का नाम से भी जाना जाता है|
  • कपास की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त मिट्टी होती है|
  • अतः इसे काली कपास के मिट्टी भी कहा जाता है|अन्य फसलों में गेहूं ज्वार बाजरा आदि को हो उगाया  जाता है|
  • भारत में काली मिट्टी गुजरात महाराष्ट्र मध्य प्रदेश के पश्चिमी क्षेत्र उड़ीसा के दक्षिणी क्षेत्र कर्नाटक की उत्तरी जिला आंध्र प्रदेश के दक्षिणी एवं समुद्र तट क्षेत्र तमिलनाडु के सालेम रामनाथपुरम कोयंबटूर जिलों एवं राजस्थान के बूंदी एवं टोंक जिले में पाई जाती है|
  • लाल मिट्टी:- इस मृदा का विस्तार देश के 18.6% भूभाग पर है |
  • इसका निर्माण जलवायु परिवर्तन के परिणाम स्वरूप रवेदार एवं कायांतरित शैलो के विघटन एवं वियोजन से होता है|
  • इस मिट्टी में सिलिका एवं आयरन की बहुलता होती है|
  • लाल मिट्टी का लाल रंग लौह ऑक्साइड की उपस्थिति के कारण होता है| लेकिन जल योजक रूप में  पीली दिखाई पड़ती है|
  • यह अम्लीय प्रकृति के होती है| इसमें नाइट्रोजन फास्फोरस एवं हुमस की कमी होती है|
  • यह मिट्टी प्रायः उर्वरता वहीं बंजर भूमि  में पाई जाती है| इस मिट्टी में कपास गेहूं  मोटे अनाजों की कृषि की जाती है|
  • भारत में यह मिट्टी आंध्र प्रदेश मध्य प्रदेश के पूर्वी भाग छोटा नागपुर के पठार क्षेत्र पश्चिम बंगाल के उत्तरी पश्चिमी जिलों में मेघालय के पहाड़ी क्षेत्रों नागालैंड राजस्थान में अरावली के पूर्वी क्षेत्र महाराष्ट्र तमिलनाडु कर्नाटक के कुछ भागों में पाई जाती हैं|
  • चुना का इस्तेमाल कर लाल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाई जाती है|
  • लेटराइट मिट्टी:- यह मिट्टी देश के लगभग 7% भूभाग पर पायी जाती है |
  • इसका निर्माण मानसूनी जलवायु की आद्रता एवं शुष्कता के क्रमिक परिवर्तन के परिणाम स्वरूप उत्पन्न विशिष्ट परिस्थितियों में होता है |इसमें आयरन एवं सिलिका की बहुलता होती है सैलो के टूट-फूट से निर्मित होने वाली इस मिट्टी को गहरी लाल लेटराइट सफेद लेटराइट तथा भूमिगत जल वायु लेटराइट के रूप में वर्गीकृत किया गया है
  • गहरी लाल लेटराइट में लौह ऑक्साइड तथा पोटाश की बहुलता  होती है|, इसकी उर्वरक क्षमता कम होती है|
  • सफेद लेटराइट की उर्वरता सबसे कम होती है और केओलिन के कारण इसका का रंग सफेद होता है|
  • भूमिगत जलवायु लेटराइट काफी उपजाऊ होती है| क्योंकि वर्षा काल में लोह ऑक्साइड जल के साथ मिलकर नीचे चले जाता है|
  • लेटराइट मिट्टी चाय की खेती के लिए सर्वाधिक उपयुक्त होती है|
  • मरुस्थलीय मिट्टी :- ये मृदाएँ शुष्क तथा आर्द्र शुष्क प्रदेशों में पायी जाती हैं इस प्रकार की मृदाएँ मुख्य रूप से राजस्थान,हरियाणा पश्चिमी उत्तर प्रदेश, दक्षिणी पंजाब के भागों में पायीं जातीं हैं |
  • इस प्रकार यह मिट्टी 2.85 लाख किमी भूभाग में फैली है|
  • पानी की कमी और अधिक तापमान के कारण ये मृदाएँ टूटकर बालू के कणों में विखंडित हो जातीं हैं |
  • इसमें फास्फोरस अधिक मात्रा में पाया जाता है लेकिन इनमे जीवांश ईधन और नाइट्रोजन की कमी होती है |
  • पर्वतीय मृदाएँ :- इसका विस्तार भारत में लगभग 3 लाख वर्ग किमी में पाया जाता है | इसे वनीय मृदा भी कहते हैं |
  • इस प्रकार की मिट्टियाँ कश्मीर से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक फैली हई है |
  • इसमें जीवांश अधिक मात्रा में पाये जाते हैं लेकिन फास्फोरस, पोटाश, चूना की कमी होती है |
  • यह मृदा सेव, नाशपाती और अलूचा आदि के लिए अच्छी मानी जाती है |

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